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Showing posts from April, 2020

दोहा लेखन विधान

     दोहा लेखन विधान १. दोहा द्विपदिक छंद है। दोहा में दो पंक्तियाँ (पद) होती हैं। हर पद में दो चरण होते हैं। २. दोहा मुक्तक छंद है। कथ्य (जो बात कहना चाहें वह) एक दोहे में पूर्ण हो...

वार्णिक छन्द (घनाक्षरी) का पूर्ण विधान

घनाक्षरी छंद का नामकरण  'घन' शब्द पर है जिसके हिन्दी में चार अर्थ होते हैं; 1- मेघ/बादल, 2- सघन/गहन, 3-बड़ा हथौड़ा, 4-किसी संख्या का उसी में 3 बार गुणा भी होता है। इस छंद में चारों अर्थ प्...

वात्सल्य (डॉ• राहुल शुक्ल साहिल)

स्नेह  प्रेम  ममता  का रूप  है वात्सल्य | संघर्षों  की  भीनी  सी धूप है वात्सल्य || सुख-दुख में संबल का चित्र है वात्सल्य | हर - पल  खुशनुमा  मित्र  है वात्सल्य || भावना  संवेदना  ...

तारा (पदपादाकुलक छंद)

         🌺💐  पदपादाकुलक छंद  💐🌺 शिल्प : यह एक 16 मात्रा प्रति चरण वाला चार चरणों का सम प्रवाही मात्रिक छंद है। इसकी मात्रा बाँट है ~ 2 + 4 + 4 + 4 + 2.  अर्थात इस छंद के आरम्भ और अंत में द्विकल...

लॉकडाउन और मैं (डॉ० राहुल शुक्ला साहिल)

      लॉकडाउन और मैं          (रेखाचित्र) ऐसा लग रहा है जैसे प्रकृति यह चाहती थी कि कुछ दिन मुझे शांति मिले प्रकृति जो चाहती थी वो हो गया आज सड़कों पर इतना सन्नाटा है, सड़कों पर ...

कामायनी (जय शंकर प्रसाद)

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 हिन्दी कविता Hindi Kavita जयशंकर प्रसाद Jaishankar Prasad    Home Hindi Poetry Punjabi Poetry Hindi Stories Contact Us Kamayani Jaishankar Prasad कामायनी जयशंकर प्रसाद चिंता सर्ग भाग-1 हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह एक पुरुष, भीगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह । नीचे जल था ऊपर हिम था, एक तरल था एक सघन, एक तत्व की ही प्रधानता कहो उसे जड़ या चेतन । दूर दूर तक विस्तृत था हिम स्तब्ध उसी के हृदय समान, नीरवता-सी शिला-चरण से टकराता फिरता पवमान । तरूण तपस्वी-सा वह बैठा साधन करता सुर-श्मशान, नीचे प्रलय सिंधु लहरों का होता था सकरुण अवसान। उसी तपस्वी-से लंबे थे देवदारू दो चार खड़े, हुए हिम-धवल, जैसे पत्थर बनकर ठिठुरे रहे अड़े। अवयव की दृढ मांस-पेशियाँ, ऊर्जस्वित था वीर्य्य अपार, स्फीत शिरायें, स्वस्थ रक्त का होता था जिनमें संचार। चिंता-कातर वदन हो रहा पौरूष जिसमें ओत-प्रोत, उधर उपेक्षामय यौवन का बहता भीतर मधुमय स्रोत। बँधी महावट से नौका थी सूखे में अब पड़ी रही, उतर चला था वह जल-प्लावन, और निकलने लगी मही। निकल रही थी म...