शृंगारिक शायरी/मुक्तक
दिल की लगी का सुरूर हो गया|
प्यार में आशिक मजबूर हो गया|
कसूर तेरा नही कम्बख्त उम्र का है|
हर नज़र में नूर ही नूर हो गया|
मुहब्बत में खता करना बड़ा आसान लगता है|
मुहब्बत को जता देना बड़ा सम्मान लगता है|
मुहब्बत खेलने की चीज तो होती नही प्रियवर|
मुहब्बत में फिसल जाना बड़ा संधान लगता है |
जफा ना रास आई
वफा न दे तन्हाई
खफा क्यूँ हो भाई
बहुत बढ़ी है महंगाई |
पंछी नदियाँ हवा के फुहारें,
तेरे साथ से होगी रोशन बहारें,
दुख में सुखों का संगम बनेगा,
जीवन चलेगा स्नेह के सहारे|
जो दिल में है वो नसीब जरूर होगी,
उसको पाने की तरकीब जरूर होगी,
बड़ी शिद्दत से आपने इजहार किया है,
वो दिलरुबा ख़ुशनसीब जरूर होगी |
जरूरतमंद की सेवा धरम का पाठ होती है,
करम करना सुखी रहना यही तो ठाठ होती है,
मनुज बनकर मनुजता का यही मैं पाठ सीखा हूँ,
धरा पर प्रेम ही सुन्दर सुनहरी गाँठ होती है|
जो कवि न मढ़ता हो, वो कविता हो नही सकती |
जिसे कोई न पढ़ता हो, वो कविता हो नही सकती |
काव्य का दौर कैसा है, बस लिख रहे हैं क्या |
जिसे गढ़ता हृदय न हो वो कविता हो नही सकती |
सुधर जाओ सुधारों जल्द ही अपने करम,
प्रेम के भाव से सेवा का हो पूरा धरम,
दिलों की धड़कनें जो साथ देगी राग का,
टूट जाएंगे लोगों के दिलों के सब भरम |
चली आओ सुहानी शाम तुम बिन है अधूरी सी;
विरह की रात पे पड़ती नही बरसात पूरी सी;
मचल जाए हृदय मेरा सुनो अब प्रेम सींचन से;
कि कट जाए हमारे बीच की वीरान दूरी सी |
मुहब्ब़त का मुंतज़िर हूँ,
हुस्न का दीदार करता हूँ,
जिन्दगी के फलसफे में,
प्रेम का इजहार करता हूँ |
©️ डॉ० राहुल शुक्ल साहिल
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