मजदूर हुआ मजबूर (डॉ• राहुल शुक्ल साहिल)

चिलचिलाती धूप में कुछ कह रही  है आत्मा,
कब तलक होगा निगोड़े वाइरस का खात्मा,
लॉकडाऊन  झेलकर मजबूर हम  ऐसे  हुए,
किस तरह से पूर्ण होगा ये सफर परमात्मा||

कहर है ये वाइरस का, या कथा  कुछ और है,
नीति के इस खेल में मेरी  व्यथा कुछ और है,
प्रकृति  से है प्रार्थना  वरदान अब तो दीजिए,
वाइरस को  मारने की व्यवस्था कुछ और है|

को- रोना   को- रोना, को- रोना  का   कहर,
अब खत्म होकर रहेगा को- रोना का  पहर,
प्रकृति की ही औषधि से वाइरस को मार दो,
तब कहीं ये खत्म होगा को- रोना का जहर|

©️ डॉ• राहुल शुक्ल साहिल

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