"एक शिशु है जिसकी माँ उसे जन्म देते ही मृत्यु को प्राप्त हो चुकी है"
(एक शिशु है जिसकी माँ उसे जन्म देते ही मृत्यु को प्राप्त हो चुकी है।)
ऐसी घटना की वेदनाओं को हृदय में उतारकर शिशु के हावभाव व भविष्य को कवि डॉ० राहुल शुक्ल साहिल जी ने अभिव्यक्त करने की कोशिश की है|
उसकी नजरें खोज रही थी|
तन की हलचल बोल रही थी||
रो- रो कर जैसे पूछ रहा वो|
अपनी माता खोज रहा वो||
मधुकर्कश स्वर गूंज रहा था|
रोना उसका बेध रहा था||
तन- मन सब कुछ जिसका है|
फिर माता पर हक किसका है ||
जिसने नौ मास खिलाया था||
क्यूँ उसने मुझे जिलाया था|
मुझको जन कर वो छोड़ गयी|
उम्मीदें सारी तोड़ गयी ||
क्यूँ आँख बंद कर लेटी है|
क्यूँ तन पर धवल लपेटी है||
उस जगत पिता से पूछूँगा|
किसकी किस्मत मैं कोसूँगा||
मुझको बाहों में भर न सकी|
उसकी मर्जी चल न सकी||
मेरे भाग्य में ऐसा क्यूँ |
बस मैं जीवित हूँ ऐसा क्यूँ ||
मुझको ही बुला लिया होता|
जननी को जिला दिया होता||
शिशु पल-पल जैसे पूछ रहा|
जग सृष्टा से मन पूछ रहा||
बालक जन माता सोय गयी
शिशु की जननी खोय गयी||
खुशियों की सौगातें टूटी|
उत्सव की सब बातें टूटी||
मातम का मंजर पसर गया|
शिशु का शुभ जीवन बिखर गया||
देखा साहिल जब मंजर को|
किस्मत के धँसते बंजर को||
सारी दुनिया को भूल गया|
बस पाँव सिमटकर फूल गया||
मन के भावों को लिख पाना|
दुष्कर है दिल का रूक पाना||
शिशु के भावों को पिरो सकूँ |
कर्मो के फल को तिरो सकूँ||
कवि रचना में वो बात कहाँ |
मनु की जग में औकात कहाँ||
बस माँग इक है विधाता से|
शिशु दूर न हो निज माता से||
© डॉ०राहुल शुक्ल साहिल
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मनुष्य की भावनाओं को समझना कोई खिलवाड़ नही| कवि का कोमल हृदय जब पिघलता है, तो शब्दों की रसधार बह जाती है | धन्यवाद!
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