हिन्दी कविता Hindi Kavita जयशंकर प्रसाद Jaishankar Prasad Home Hindi Poetry Punjabi Poetry Hindi Stories Contact Us Kamayani Jaishankar Prasad कामायनी जयशंकर प्रसाद चिंता सर्ग भाग-1 हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह एक पुरुष, भीगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह । नीचे जल था ऊपर हिम था, एक तरल था एक सघन, एक तत्व की ही प्रधानता कहो उसे जड़ या चेतन । दूर दूर तक विस्तृत था हिम स्तब्ध उसी के हृदय समान, नीरवता-सी शिला-चरण से टकराता फिरता पवमान । तरूण तपस्वी-सा वह बैठा साधन करता सुर-श्मशान, नीचे प्रलय सिंधु लहरों का होता था सकरुण अवसान। उसी तपस्वी-से लंबे थे देवदारू दो चार खड़े, हुए हिम-धवल, जैसे पत्थर बनकर ठिठुरे रहे अड़े। अवयव की दृढ मांस-पेशियाँ, ऊर्जस्वित था वीर्य्य अपार, स्फीत शिरायें, स्वस्थ रक्त का होता था जिनमें संचार। चिंता-कातर वदन हो रहा पौरूष जिसमें ओत-प्रोत, उधर उपेक्षामय यौवन का बहता भीतर मधुमय स्रोत। बँधी महावट से नौका थी सूखे में अब पड़ी रही, उतर चला था वह जल-प्लावन, और निकलने लगी मही। निकल रही थी म...
मन में भी आँधी और तूफान होता है भाव भी आँधी और तूफान लाते हैं बदल देते है जिन्दगी के मायने को बिखर जाता है सपनों का महल टूट जाते हैं गुरबत के आशियाने कुछ बोल नही पाती उम्मीदो...
चन्द्रयान चन्द्रयान है कितना सुन्दर, चाँद देखकर आएगा| मंजिल उसकी होगी पूरी, हर दिल खुशी मनाएगा| बड़े जतन से बड़े यतन से, चन्द्रयान बन पाया है | विक्रम को पहुँचाने द...
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